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ध्यान से सम्भल जाते हैं,

जोश, खाब
लोभ, मोह
इन शब्द का
आपस में कोई संबंध नहीं
लोहे में जंग सा काम
करते हैं ये शब्द।
आपस में ही ,
एक दूसरे से
भीड़ जाते हैं ये शब्द।
जीने मरने की नोबत,
लाते हैं ये शब्द।
ध्यान से सम्भल जाते हैं
वरना बिगाड़ देते हैं,
ये शब्द।

– मनीषा कुमारी

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आवाज़ की गलियाँ

आवाजों की गलियों को खोलो
कहीं, आवाज़ न बैठ जाए।
आवाजों की गलतियाँ क्या निकलते हो,
ज़रा आवाजों को गुनगुनाएँ
आवाजों की गलियों को अपनाएँ,
ज़रा आवाजों को आजमाएँ
इसमें से तो,
अच्छे सुर भी है निकलते,
आप ज़रा अच्छा बोल कर दिखाएँ,
आवाज़ का दोष न लगाएँ,
आवाज़ को कला की तरह गुनगुनाएँ।

– मनीषा कुमारी

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बंजर ज़मीन

बंजर ज़मीन

बंजर ज़मीन मेहनत की भूखी है
तभी तो ये सूखी है
ये बहुत मेहनत करवाती है
कहने को अनाड़ी है
लेकिन ये ही सबक सिखाती है
मेहनत का पाठ बताती है।
वैसे तो रुलाती है
लेकिन मन को मजबूत बनाती है।

– मनीषा कुमारी

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हाथों की लकीरें और पत्थर

हाथों की लकीरें और पत्थर,
दोनों को ही बदलना मुश्किल होता है।
लेकिन किसी न किसी दिन,
ये दोनों बदल के ही रेहते हैं।

– मनीषा कुमारी

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चुप्पी

लोगों पर चुप्पी लगती नहीं,
खुद पे लगाए तो जचती नहीं।
खुद की करे तो बेकार हैं
दूसरों की करे तो बेदिमाग है।
अपनी दुनिया में खुद ही बदनाम है
चुप्पी की कहानियाँ ही
बेमिसाल है।

– मनीषा कुमारी

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जिंदगी का इम्तिहान

जिंदगी इम्तिहान बन गयी,
पल पल की कहानी गढ़ रही,
हर वक्त सवाल पूछ रही,
जवाब में,
अच्छे बुरे का बंधन बना रही।
सवालों के पुलों से गुज़र,
जब जवाब तक पहुँचते हैं,
पहुँचने से पहले ही,
पुल गिरते अपने भारों से,
लगता है जिंदगी,
इम्तिहान नहीं,
कसरत करवा रही।

– मनीषा कुमारी

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हादसे के पीछे का कारण

हर रोज़ शाम है होती
जैसे हर रोज़ डूबा देता है
कोई सूरज को दूर
ताली कभी
एक हाथ से नहीं बजती
हर हादसे के पीछे छुपा है
कारण घनघोर।

– मनीषा कुमारी

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अपनापन अंधेरे से

अपनापन अपनापन,
अपनेपन की बात क्या करते हो,
कुछ पल की देरी से,
नाराज़ तुम होते हो।
रात तुझे पता है,
बस तू ही वो वक्त है,
जब कुछ लिखना भाता है।
अंधेरे का अपनापन मुझे,
खींच लाता है।

– मनीषा कुमारी

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ये मन है कि

समय आज कल,
बहुत जल्दी बीत जाता है,
सोंचते – सोंचते न जाने…
कहाँ ये खो जाता है
जाने अनजाने में…
बहुत कुछ कह जाता है,
ये मन है कि,
हर वक्त बोलता ही रहता है।
सुनता किसी की नहीं,
और करता बिना सोंचे समझे है,
कुछ गलत हो जाने पर दोष
इस दिल और दिमाग का लगता है।
फिर भी,
ये मन है कि,
हर वक्त चलता ही रहता है।

– मनीषा कुमारी

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जीत की बाज़ी

जिंदगी तुझसे शिकायत कैसी,
दुनिया की रीत ही ऐसी,
इस जहाँ में बहोत है तेज़ी,
फिर भी हाथों में होगी,
हमारी जीत की बाज़ी।

– मनीषा कुमारी