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Motivational poetry

काँटों के बगान

काँटें भी शान है, बगीचों के
काँटों के कारण ही,
नहीं बनती फूलों की जिंदगी वीरान।
आती है बहार तो,
महकाती है हर एक बाग।
लेकिन थोड़ी सी ज़रूरत के लिए,
लोग उजाड़ देते हैं,
पूरा एक बगान।
उनके लिए सबक है,
और फूलों के लिए रक्षक है,
ये काँटों के बगान।

– मनीषा कुमारी

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Motivational poetry

गहने कभी…..

गहने कभी
किसी की अच्छाई या बुराई नही दिखाते
किसी की अच्छाई या बुराई तो
उसके विचार बताते हैं
अगर गहने ही अच्छे बुरे का भेद बता देते
तो कभी रंग, जाती, धर्म में
भेद नही करते
सिर्फ गहनों देख कर ही
किसी के गुण बता देते।

– मनीषा कुमारी

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Musings poetry

प्रकृति की प्रेम कहानी

प्रकृति की प्रेम कहानी
है बहुत सीधी – साधी,
लेकिन ये कहानी,
किसी किसी को ही
समझ मे है आती।
कण कण को बटोर कर,
कभी कोई चीज़ बनाती।
कभी पल में ही किसी,
पहाड़ को मिट्टी में है मिलाती।
प्रकृति की प्रेम कहानी
है बहुत सीधी साधी,
लेकिन ये कहानी
किसी को ही
समझ मे है आती।

– मनीषा कुमारी

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Motivational poetry

खर्च करना आसान है

खर्च करना आसान है
किसी और के पैसे खर्च करना आसान है,
माँ बाप के पैसों पर ऐश करना आसान है।
लेकिन जब खुद कमाने लगोगे,
तभी बनती तुम्हारी पहचान है।
तब तुम एक एक पैसे का मोल समझ पाओगे,
आओगे जाओगे कहीं तभी,
रास्तों को समझ पाओगे,
नहीं तो जहाँ हो बस वहीं रह जाओगे।


– मनीषा कुमारी

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Motivational poetry

दिल का समुन्द्र

समुन्द्र अच्छा तो लगता है
लेकिन समुन्द्र से गुजरना
अच्छा नहीं लगता
वो लेहरें सिर्फ देखने में अच्छी है
पास जाने पर
बहोत झटके देती है
इस समुन्द्र अपनी एक कहानी है
वो भी बहुत गहरी है
दिल के करीब समुन्द्र की लेहरें
बहुत चलती है।
बस नुकसान पहुँचाना
नही जानती
समुन्द्र कब नुकसान करे
इसका पता भी नही चलता।

– मनीषा कुमारी

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Motivational poetry

भाव भावनाएँ परेशान करती हैं…

भाव भावनाएँ परेशान करती हैं,
लेकिन यही दिल साफ करती हैं,
हर भावना में राज़ छिपा होता है,
वो हर राज़ का पर्दाफाश करती है,
भावनाएँ ही हमे,
जीने का ढंग सिखाती है,
हर किसी को जीने का अर्थ समझती है।
समुन्द्र की लेहरों सी
ये भावनायें होती हैं
कभी ज़रूरत से ज़्यादा होती हैं,
तो कभी जरूरत से ज़्यादा शांत होती है।

– मनीषा कुमारी

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Motivational poetry

लिखने को शब्द….

लिखने को शब्द कम पड़ते हैं,
लिखने कागज़ कम पड़ते हैं।
सच ये है कि कुछ भी कम नही पड़ता बस, ख्याल कम पड़ते हैं।

– मनीषा कुमारी

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ध्यान से सम्भल जाते हैं,

जोश, खाब
लोभ, मोह
इन शब्द का
आपस में कोई संबंध नहीं
लोहे में जंग सा काम
करते हैं ये शब्द।
आपस में ही ,
एक दूसरे से
भीड़ जाते हैं ये शब्द।
जीने मरने की नोबत,
लाते हैं ये शब्द।
ध्यान से सम्भल जाते हैं
वरना बिगाड़ देते हैं,
ये शब्द।

– मनीषा कुमारी

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आवाज़ की गलियाँ

आवाजों की गलियों को खोलो
कहीं, आवाज़ न बैठ जाए।
आवाजों की गलतियाँ क्या निकलते हो,
ज़रा आवाजों को गुनगुनाएँ
आवाजों की गलियों को अपनाएँ,
ज़रा आवाजों को आजमाएँ
इसमें से तो,
अच्छे सुर भी है निकलते,
आप ज़रा अच्छा बोल कर दिखाएँ,
आवाज़ का दोष न लगाएँ,
आवाज़ को कला की तरह गुनगुनाएँ।

– मनीषा कुमारी

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बंजर ज़मीन

बंजर ज़मीन

बंजर ज़मीन मेहनत की भूखी है
तभी तो ये सूखी है
ये बहुत मेहनत करवाती है
कहने को अनाड़ी है
लेकिन ये ही सबक सिखाती है
मेहनत का पाठ बताती है।
वैसे तो रुलाती है
लेकिन मन को मजबूत बनाती है।

– मनीषा कुमारी