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Motivational poetry

करना है खुद के लिए…..

दुनिया के लिए नहीं अपने लिए,
रोज़ ही किया
किसी दूसरे के लिए,
अब करना है सिर्फ खुद के लिए,
दुनिया तो खुद ब खुद,
अच्छी लगने लगेगी।
कभी तो कीजिए,
खुद के लिए।
समझिये दुनिया को,
जानने के लिए।
पहचानिए दुनिया को,
पहचान बनाने के लिए।
रोज़ ही किया,
किसी दूसरे के लिए।
अब करना है सिर्फ खुद के लिए।

– मनीषा कुमारी

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Motivational poetry

राजनीति एक सर्कस

सर्कस, राजनीति की
बहुत गहरी है।
राजनीति एक सर्कस है
ये बात सच्ची है।
लोग चाहे जो कहे
बस कोई न कोई
उदास कर ही देती है।
राजनीति सर्कस सी ही है,
दोनों ही,
कभी हँसाती हैं,
कभी रुलाती हैं।

– मनीषा कुमारी

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मुलाकात जरूरी है…

खुशियों से हर दिन,
मुलाकात करना जरूरी है।
नही तो,
उदासी के रिश्तेदार बनने से,
उम्र कम हो जाती है।

– मनीषा कुमारी

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तपती दुपहरी

तपती दुपहरी में लोग,
तरसते बहुत हैं।
आने जाने में लोग,
हिचकिचाते बहुत हैं।
इस दुपहरी में,
लोग चकराते बहुत हैं।
जिसे हुआ जुखाम,
वे राहत पाते हैं।
इस तपती दुपहरी को,
वे दुआ देते बहुत हैं।

– मनीषा कुमारी

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रिश्तों की होड़

देखो कैसा ये रिश्तों का डोर,
लड़के वाले
और लड़की वालों के बीच,
कैसी ये होड़।
इतनी तो न होती,
कभी घोड़ों दौड़।
इनकी तुलना में है,
आम जैसे फल।
प्रकार जिसके कई हैं,
स्वाद भी अलग – अलग।
कभी संस्कारी कभी मॉडर्न का छिलका,
कभी मांगो में गाँव वाली चाहिए,
कभी शहर की कोई लड़की चाहिए,
नही तो सिर्फ घरवाली चाहिए।
सच में अनोखी है,
ये रिश्तों की होड़।

– मनीषा कुमारी

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घाव वाली ऊँगली

घाव वाली ऊँगली से,
लिखा बहोत है।
कलम से सिहाई को,
बहाया बहोत है।
लेकिन जिंदगी की दास्ताँ,
लिखनी बहोत है।

– मनीषा कुमारी

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लोग बरसते हैं

लोग बरसते हैं,
बरसने के लिए।
हम गरजते हैं
गरजने के लिए।
लेकिन अब अपनी,
दुनिया ही अलग है।
हम छाँव लाते हैं,
बरसने के लिए,
गरजते सिर्फ तूफानों में हैं।
लोग चाहे बरसते हैं,
बरसने के लिए।

– मनीषा कुमारी

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कुछ बाकी है..

लिखना तो कुछ नही
लेकिन लिख कर भी
बहुत कुछ लिखना बाकी है।
कई शब्दों को पढ़ना,
कई किताबों को टटोलना बाकी है
नही है जिंदगी, फिर भी
जीना बाकी है।
हर मुश्किल के बाद भी
परेशान होना बाकी है।
उदास बहुत हैं,
लेकिन खुश होना बाकी है।
जिंदगी की राह में अभी,
बहुत दूर चलना बाकी है।
देखो कहीं,
जिंदगी रो तो नही रही,
अभी बहुत रूठना बाकी है।
जिंदगी की राह में
बहुत दूर चलना बाकी है
न जाने कौनसा गिला है हमें
की हमें गिर कर फिर,
उठना बाकी है।

– मनीषा कुमारी

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भावों की पकड़

दिन रात सोंचना,
भागदौड़ फिर सोंचना,
कभी खुश होना,
कभी रोना,
कभी कभी,
गुस्सा न बर्दाश्त होना,
चलना फिर रुक जाना,
सारे लक्षण हैं हमसे,
भावों की पकड़ का न होना।
भावों की पकड़ में इंसान,
बहोत शांत होता है।
भावनाओं में बहने से,
इंसान ही बह जाता है।
शांत से अशांत होजाना,
सारे लक्षण हैं हमसे,
भावों की पकड़ का न होना।

– मनीषा कुमारी

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हवा घूमती बहोत है

तूफानों से न पूछो,
हवा का रुख क्या है।
मोहल्ले भर में चर्चा है,
की हवा घूमती बहोत है।

– मनीषा कुमारी