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काँटों के बगान

काँटें भी शान है, बगीचों के
काँटों के कारण ही,
नहीं बनती फूलों की जिंदगी वीरान।
आती है बहार तो,
महकाती है हर एक बाग।
लेकिन थोड़ी सी ज़रूरत के लिए,
लोग उजाड़ देते हैं,
पूरा एक बगान।
उनके लिए सबक है,
और फूलों के लिए रक्षक है,
ये काँटों के बगान।

– मनीषा कुमारी

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Motivational poetry

प्रकृति की ताकत

क्या करे परेशान हम भी है,
कभी दिन की दूप,
और कभी बरसात की ठंडी सताती है।
ठंडी में गर्मी के आने का,
और गर्मी में ठंडी का इंतजार हो रहा।
दोनो मौसम के साथ मे होने से
हम परेशान तो बहुत हैं,
लेकिन ऐसा होना भी ज़रूरी है
नही तो प्रकृति की ताकत को,
कोई नहीं समझ सकता।

– मनीषा कुमारी

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Motivational Musings poetry

हम कामचोर नहीं….

करना बहुत कुछ है,
बस मन नहीं करता।
वक्त तो बहुत है,
लेकिन कुछ समझ नहीं आता।
तुम हम पर दोष लगाते हो,
लेकिन कभी तुमने भी तो,
कभी हमारे कर्म को नहीं देखा।
हमने जो भी किया,
तुमने कभी ध्यान नहीं दिया।
मेहनत रख दी तुम्हारे सामने,
और तुमने हमेशा नज़र अंदाज़ किया।
सही को तुमने जब गलत कहा,
हमने वो भी मान लिया।
हम आलसी नहीं,
बस खुद से ही नाराज़ हैं।
कामचोर नहीं हम तो
खुद में परेशान हैं।

– मनीषा कुमारी

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नाज़ुक दौर

नाज़ुक दौर तो सबका होता है,
उससे गुज़र सबको
आगे बढ़ना पड़ता है।
कोई आगे बढ़ जाता है,
तो कोई पीछे छूट जाता है।
जाने कोई क्यों,
कुछ चीजों से
उभर ही नहीं पाता है।
कभी हँसता है,
तो कभी रोता है।
कोई तो, दुनिया को
हर नज़र से देखते हैं
कुछ तो एक ही पल में
हार मान जाते हैं।
दुनिया उतनी छोटी नहीं
जितनी जल्दी लोग
हार मानते हैं।
एक बार प्रकृति के बारे में
जानना शुरू करो
देखना हार मानना भूल जाओगे।

– मनीषा कुमारी

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गहने कभी…..

गहने कभी
किसी की अच्छाई या बुराई नही दिखाते
किसी की अच्छाई या बुराई तो
उसके विचार बताते हैं
अगर गहने ही अच्छे बुरे का भेद बता देते
तो कभी रंग, जाती, धर्म में
भेद नही करते
सिर्फ गहनों देख कर ही
किसी के गुण बता देते।

– मनीषा कुमारी

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Musings poetry

प्रकृति की प्रेम कहानी

प्रकृति की प्रेम कहानी
है बहुत सीधी – साधी,
लेकिन ये कहानी,
किसी किसी को ही
समझ मे है आती।
कण कण को बटोर कर,
कभी कोई चीज़ बनाती।
कभी पल में ही किसी,
पहाड़ को मिट्टी में है मिलाती।
प्रकृति की प्रेम कहानी
है बहुत सीधी साधी,
लेकिन ये कहानी
किसी को ही
समझ मे है आती।

– मनीषा कुमारी

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समझ आयी झटका लगने पर

हर वक्त चलते विचार हैं,
अपनी कोशिश को छोड़,
अपनी मंजिल को छोड़,
चल पड़े थे झुग्नु कि तरह
बिजली की ताड़ पर।
झटका लगने पर ही समझ आया कि,
कबका छोड़ चले मंजिल को,
किसी और की तलाश में।
मेहनत की नदियाँ छोड़
चल पड़े था,
आकर्षण की चिकनी मिट्टी पहनने
अहसास तो था कि कुछ गलत है
लेकिन झटका लगने पर समझ आया
की आकर्षण की चिकनी मिट्टी तो
मेहनत की नदियों से बनी हैं।

– मनीषा कुमारी

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राजनीति की भाषा

राजनीति की भाषा समझना मुश्किल है,
उसे समझाना मुश्किल है।
आज कल तो,
गली गली राजनीति चल पड़ी।
हर जगह राजनीति का,
दौर दिखता है।
ये राजनीति की भाषा
किसी किसी को ही समझ आ रही।
जिसको समझ आ रही,
वो राजनीति में चला जाता है
कोई अच्छा तो कोई बुरा बन जाता है,
राजनीति की भाषा को
सरल बनाना होगा।
हर नागरिक तक आवाज़ पहुँचे,
ऐसा कुछ कर दिखाना होगा।

– मनीषा कुमारी

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भाव भावनाएँ परेशान करती हैं…

भाव भावनाएँ परेशान करती हैं,
लेकिन यही दिल साफ करती हैं,
हर भावना में राज़ छिपा होता है,
वो हर राज़ का पर्दाफाश करती है,
भावनाएँ ही हमे,
जीने का ढंग सिखाती है,
हर किसी को जीने का अर्थ समझती है।
समुन्द्र की लेहरों सी
ये भावनायें होती हैं
कभी ज़रूरत से ज़्यादा होती हैं,
तो कभी जरूरत से ज़्यादा शांत होती है।

– मनीषा कुमारी

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आसमाँ से सूरज

आसमाँ से सूरज,
ढ़लता हुआ देखा।
किसी को,
किसी की तरफ जाते हुये देखा।
आना जाना तो,
हर किसी को था।
लेकिन दो खाबों का मिलना,
भी ज़रूरी था।
उन विचारों को मिलना,
भी ज़रूरी था।
रास्ते तो हर जगह हैं,
लेकिन खुद को
खुदसे मिलाना भी
ज़रूरी था।
आना जाना शब्दों का,
लगा ही रहता है।
देखने को मंजिल,
अधूरा ही रहता है।
दुनिया की हर चीज़,
अधूरी ही तो है।
बस पूरी करने में,
पूरा साल लगता है।
आसमाँ से सूरज,
ढ़लता हुआ तो
ज़रूर लगता है,
लेकिन अगले दिन
फिर उगता भी
ज़रूर है।

– मनीषा कुमारी