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बात

आज कल बात भी बात से डरती है,
ये तो आपस मे ही रंग बदलती है।
आपस में टकराकर ये रास्ता भूल जाते हैं,
ये तो खुद चकराकर खुद घूम जाती है।
गोल गोल घूम कर पृथ्वी को रुक बताती है,
ये तो सिर्फ दिमाग खाती है।
ये तो बहोत पकाती है,
लेकिन ये ज्ञान भी लाती है,
ये तो सब कुछ जानती है।

– मनीषा कुमारी

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स्वस्थ रहो इतना…

स्वस्थ रहो इतना की,
कमजोरी भी आने से डरे।
तंदरुस्त रहो इतना की,
बुढापा भी कमजोर होने से डरे।
बीमार तो नही,
बीमारी भी पास न आये।

– मनीषा कुमारी

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जिंदगी भी भूल करती है

कभी कभी जिंदगी भी भूल जाती है,
हम चाहते कुछ है और कर कुछ देती है।

तूफ़ाँ को मिटा ये मिट्टी कर देती है,
हर जंजीर तोड़ ये छुट्टी कर देती है।

हम अच्छा करे तो अच्छा करती है,
बुरा करे तो बुरा करती है।

लेकिन कभी जिंदगी भी भूल करती है,
हम चाहते कुछ हैं कर कुछ देती है।

– मनीषा कुमारी

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एक दिया काफी था

एक दिया काफी था,
अंधेरों को हटाने के लिए।
और अंधेरा सोंचता रहा,
की वही काफी है सबके लिए।
सूरज को छुपा देने से,
उसकी किरणें नही छुपती।
अंधेरा कितना ही है,
लेकिन किरणे ही है काफी
उन्हें मिटाने के लिए।

– मनीषा कुमारी

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जरूरी नही

जरूरी नही की हम, अपनी बात सबको सुनाएँ,
जरूरी नही की सब तुम्हे सनें,
और सब तुम्हे समझ भी जाये।
कुछ लोग तमाशा बनाने का मौका नही छोड़ते,
जरूरी है की कुछ बातें खुद तक रहे,
खुद को बता कर खुदही सम्भल जाए।

– मनीषा कुमारी

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दयालु मोर

एक सुंदर और प्यारा सा मौर था जिसकी सुंदरता पूरे जंगल में सभी जानवर से सुंदर था। वो मौर बहुत दयालु, नैक और बड़े दिल वाला था। उसकी सुंदरता के कारण कई लोग उससे जलते थे, लेकिन कई लोग उसे पसंद भी करते थे। उन जलने वालों को उसकी अच्छाई से कोई मतलब नही था। सिर्फ उसकी सुंदरता से जलते रहते थे। कुछ लोग तो यूँ ही उसे सामने से ताने सुना कर चल दिया करते थे। इस वजह से मौर थोड़ी दैर के लिए दुखी हो जाता था लेकिन फिर वो अपनी किसी भूल का प्रयाश्चित समझ कर सह लेता था।

लेकिन जब लाख सुधार करने पर भी कुछ नही हुआ तो उसने उन लोगों को जवाब देना शुरू कर दिया। उसे लगा कि इससे वो सभी चुप हो जाएंगे। लेकिन इस वजह से उसे और ज़्यादा ताने सुन्ने पड़े इन सब से तंग आकर उसने खुद के रूप को तहस नहस कर दिया, इससे उसे काफी चोटें आई वो कमज़ोर पड़ गया। उसकी खूबसूरती मिट गई लेकिन उसकी अच्छाई अब भी जिंदा थी।

मौर ने ये सब उन सबको खुश करने के लिए किया था जो उससे न खुश थे। कुछ देर बाद उसे पता लगता है की वे लोग जो उसे ताने देते थे अब वो उसे कोसने लगे कि ऐसे बतसुरत को तो जीवित ही नही रहना नही चाहिए, इसे तो यहाँ से भगा देना चाहिए। इससे मौर बहोत उदास हो गया और इस वजह से उसने कहीं भी आना जाना बंद कर दिया। जब कई हफ्तों तक उसके दोस्त मिठू ने, जो कि एक तोता है मौर से मिलने की सोंचा। जब वो अपने दोस्त के पास जाने के लिए निकला तो उसने अपने दोस्त के बारे कई बातें सुनी। वो लोग उसके दोस्त के बारे में कई अच्छी बुरी बातें बोल रहे थे एक ने तो तोते को ये भी बताया कि उसका दोस्त मौर कई दिनों से घर से बाहर ही नही निकला है। तब मिठू को चिंता होने लगी और वो अपने दोस्त के पास जल्दी से पहोंचा।

उसके घर पहोंच कर उसने मौर का हाल पूछा तब उसने आप बीती सुनाई। इस बात पर तोते ने उससे सवाल पूछा की तुम अपने लिया जीना चाहते हो कि दूसरों के लिए। क्योंकि खुद के लिए जी कर दूसरों को खुश रखना मुश्किल है क्यूंकि आज तक जिसने भी ये कोशिश की है वो निराश होकर ही जिंदगी से विदा ले जाता है। खुद पर विश्वाश रख कर आगे बढ़ोगे तो कई लोग तुमसे जलेंगे और कई ऐसे भी होंगे जो तुमसे बहोत खुश होंगे इसलिए दूसरों पे ध्यान देने के बजाए खुद की प्रगति पर ध्यान दो। और मुझे पूरा विश्वाश है कि तुम बहोत नेक काम करते हो और करते रहोगे। ये बात सुन मौर में बहोत हिम्मत आगई और उसने कई अच्छे अच्छे काम किये। पग पग होने वाली हर परेशानी को शिक्षिक बना कर आगे बढ़ा और आलोचकों पर ध्यान न देते हुए उनसे भी सीखा। इस बात के लिए आज भी वो अपने दोस्त तोते को धन्येवाद करता है।

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प्रकृति पुकारे

प्रकृति पुकारे द्वारे द्वारे
ये द्वार भी खत्म हुए
हर ओर भटकी ये प्रकृति
व्यथा सुनाए इंसान को
इंसान ये कैसा है,
ये तो किसी की न सुनता है,
सच है कि सबका वक्त आता है,
तू जैसा प्रकृति को देगा
तू वैसा ही पायेगा
सदा करेगा सेवा प्रकृति की
तो सदा खुश रह पायेगा।

– मनीषा कुमारी

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ठंड का मौसम

पानी भी पानी से मिलने को तरसे,
प्रकृति अब तो सूखे से तरसे,
बिन मौसम बरसात के बदले,
बिन मौसम गर्मी आयी है।
डर तो इस बात का है बस
की ठंड का मौसम
इस दुनिया से न खत्म हो जाए।

– मनीषा कुमारी

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अपने मंजिल

अपने अपने मंज़िल
हैं अपने अपने रास्ते।
कोशिश ही है रास्ता
जो मंज़िल तक जाते।
पाना उसे मुश्किल है
बस आगे बढ़ते जाना।
एक यही है रास्ता
सब चिंता छोड़,
जुड़ जा अपने रास्ते
चल पर अपने ध्यान पे।

– मनीषा कुमारी

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गुरु

बहोत सिखया है,
बहोत पढ़ाया है,
हर राह मुझे राह बताए है,
एक माँ की तरह मुझे
बहोत कुछ बताया है,
हर अनजान राहों से,
मुझ को निकाला है,
वो गुरु ही है जिसने
मुझे खूब पढ़ाया
मुझे आगे बढ़ाया है।

– मनीषा कुमारी

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