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नाज़ुक दौर

नाज़ुक दौर तो सबका होता है,
उससे गुज़र सबको
आगे बढ़ना पड़ता है।
कोई आगे बढ़ जाता है,
तो कोई पीछे छूट जाता है।
जाने कोई क्यों,
कुछ चीजों से
उभर ही नहीं पाता है।
कभी हँसता है,
तो कभी रोता है।
कोई तो, दुनिया को
हर नज़र से देखते हैं
कुछ तो एक ही पल में
हार मान जाते हैं।
दुनिया उतनी छोटी नहीं
जितनी जल्दी लोग
हार मानते हैं।
एक बार प्रकृति के बारे में
जानना शुरू करो
देखना हार मानना भूल जाओगे।

– मनीषा कुमारी

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गहने कभी…..

गहने कभी
किसी की अच्छाई या बुराई नही दिखाते
किसी की अच्छाई या बुराई तो
उसके विचार बताते हैं
अगर गहने ही अच्छे बुरे का भेद बता देते
तो कभी रंग, जाती, धर्म में
भेद नही करते
सिर्फ गहनों देख कर ही
किसी के गुण बता देते।

– मनीषा कुमारी

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खर्च करना आसान है

खर्च करना आसान है
किसी और के पैसे खर्च करना आसान है,
माँ बाप के पैसों पर ऐश करना आसान है।
लेकिन जब खुद कमाने लगोगे,
तभी बनती तुम्हारी पहचान है।
तब तुम एक एक पैसे का मोल समझ पाओगे,
आओगे जाओगे कहीं तभी,
रास्तों को समझ पाओगे,
नहीं तो जहाँ हो बस वहीं रह जाओगे।


– मनीषा कुमारी

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समझ आयी झटका लगने पर

हर वक्त चलते विचार हैं,
अपनी कोशिश को छोड़,
अपनी मंजिल को छोड़,
चल पड़े थे झुग्नु कि तरह
बिजली की ताड़ पर।
झटका लगने पर ही समझ आया कि,
कबका छोड़ चले मंजिल को,
किसी और की तलाश में।
मेहनत की नदियाँ छोड़
चल पड़े था,
आकर्षण की चिकनी मिट्टी पहनने
अहसास तो था कि कुछ गलत है
लेकिन झटका लगने पर समझ आया
की आकर्षण की चिकनी मिट्टी तो
मेहनत की नदियों से बनी हैं।

– मनीषा कुमारी

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दिल का समुन्द्र

समुन्द्र अच्छा तो लगता है
लेकिन समुन्द्र से गुजरना
अच्छा नहीं लगता
वो लेहरें सिर्फ देखने में अच्छी है
पास जाने पर
बहोत झटके देती है
इस समुन्द्र अपनी एक कहानी है
वो भी बहुत गहरी है
दिल के करीब समुन्द्र की लेहरें
बहुत चलती है।
बस नुकसान पहुँचाना
नही जानती
समुन्द्र कब नुकसान करे
इसका पता भी नही चलता।

– मनीषा कुमारी

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राजनीति की भाषा

राजनीति की भाषा समझना मुश्किल है,
उसे समझाना मुश्किल है।
आज कल तो,
गली गली राजनीति चल पड़ी।
हर जगह राजनीति का,
दौर दिखता है।
ये राजनीति की भाषा
किसी किसी को ही समझ आ रही।
जिसको समझ आ रही,
वो राजनीति में चला जाता है
कोई अच्छा तो कोई बुरा बन जाता है,
राजनीति की भाषा को
सरल बनाना होगा।
हर नागरिक तक आवाज़ पहुँचे,
ऐसा कुछ कर दिखाना होगा।

– मनीषा कुमारी

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भाव भावनाएँ परेशान करती हैं…

भाव भावनाएँ परेशान करती हैं,
लेकिन यही दिल साफ करती हैं,
हर भावना में राज़ छिपा होता है,
वो हर राज़ का पर्दाफाश करती है,
भावनाएँ ही हमे,
जीने का ढंग सिखाती है,
हर किसी को जीने का अर्थ समझती है।
समुन्द्र की लेहरों सी
ये भावनायें होती हैं
कभी ज़रूरत से ज़्यादा होती हैं,
तो कभी जरूरत से ज़्यादा शांत होती है।

– मनीषा कुमारी

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आसमाँ से सूरज

आसमाँ से सूरज,
ढ़लता हुआ देखा।
किसी को,
किसी की तरफ जाते हुये देखा।
आना जाना तो,
हर किसी को था।
लेकिन दो खाबों का मिलना,
भी ज़रूरी था।
उन विचारों को मिलना,
भी ज़रूरी था।
रास्ते तो हर जगह हैं,
लेकिन खुद को
खुदसे मिलाना भी
ज़रूरी था।
आना जाना शब्दों का,
लगा ही रहता है।
देखने को मंजिल,
अधूरा ही रहता है।
दुनिया की हर चीज़,
अधूरी ही तो है।
बस पूरी करने में,
पूरा साल लगता है।
आसमाँ से सूरज,
ढ़लता हुआ तो
ज़रूर लगता है,
लेकिन अगले दिन
फिर उगता भी
ज़रूर है।

– मनीषा कुमारी

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लिखने को शब्द….

लिखने को शब्द कम पड़ते हैं,
लिखने कागज़ कम पड़ते हैं।
सच ये है कि कुछ भी कम नही पड़ता बस, ख्याल कम पड़ते हैं।

– मनीषा कुमारी

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ध्यान से सम्भल जाते हैं,

जोश, खाब
लोभ, मोह
इन शब्द का
आपस में कोई संबंध नहीं
लोहे में जंग सा काम
करते हैं ये शब्द।
आपस में ही ,
एक दूसरे से
भीड़ जाते हैं ये शब्द।
जीने मरने की नोबत,
लाते हैं ये शब्द।
ध्यान से सम्भल जाते हैं
वरना बिगाड़ देते हैं,
ये शब्द।

– मनीषा कुमारी