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आसमाँ से सूरज

आसमाँ से सूरज,
ढ़लता हुआ देखा।
किसी को,
किसी की तरफ जाते हुये देखा।
आना जाना तो,
हर किसी को था।
लेकिन दो खाबों का मिलना,
भी ज़रूरी था।
उन विचारों को मिलना,
भी ज़रूरी था।
रास्ते तो हर जगह हैं,
लेकिन खुद को
खुदसे मिलाना भी
ज़रूरी था।
आना जाना शब्दों का,
लगा ही रहता है।
देखने को मंजिल,
अधूरा ही रहता है।
दुनिया की हर चीज़,
अधूरी ही तो है।
बस पूरी करने में,
पूरा साल लगता है।
आसमाँ से सूरज,
ढ़लता हुआ तो
ज़रूर लगता है,
लेकिन अगले दिन
फिर उगता भी
ज़रूर है।

– मनीषा कुमारी

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लिखने को शब्द….

लिखने को शब्द कम पड़ते हैं,
लिखने कागज़ कम पड़ते हैं।
सच ये है कि कुछ भी कम नही पड़ता बस, ख्याल कम पड़ते हैं।

– मनीषा कुमारी

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ध्यान से सम्भल जाते हैं,

जोश, खाब
लोभ, मोह
इन शब्द का
आपस में कोई संबंध नहीं
लोहे में जंग सा काम
करते हैं ये शब्द।
आपस में ही ,
एक दूसरे से
भीड़ जाते हैं ये शब्द।
जीने मरने की नोबत,
लाते हैं ये शब्द।
ध्यान से सम्भल जाते हैं
वरना बिगाड़ देते हैं,
ये शब्द।

– मनीषा कुमारी

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बैठे हैं घर पर लेकिन….

बैठे हैं घर पे लेकिन,
तकलीफ बड़ी होती है।
बैठे – बैठे आजकल,
तबियत बिगड़ जाती है।
कोई ताने दे रहा,
कोई मज़ाक उड़ा रहा।
खाने को खाना,
पीने को पानी तो मिल रहा
लेकिन घर में बैठ कर,
चैन और सुकून खो चुका।
किसी दिन सबकुछ ठीक होगा,
इसकी उम्मीद बहोत है।
हो सकता है,
कल सूरज हमारा
सफलता भरा होगा।
खुलेगा सबकुछ,
खुलेगी तकदीर हमारी।
लिखी होगी किसी दिन
हमारी सफलता की कहानी।

– मनीषा कुमारी

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आवाज़ की गलियाँ

आवाजों की गलियों को खोलो
कहीं, आवाज़ न बैठ जाए।
आवाजों की गलतियाँ क्या निकलते हो,
ज़रा आवाजों को गुनगुनाएँ
आवाजों की गलियों को अपनाएँ,
ज़रा आवाजों को आजमाएँ
इसमें से तो,
अच्छे सुर भी है निकलते,
आप ज़रा अच्छा बोल कर दिखाएँ,
आवाज़ का दोष न लगाएँ,
आवाज़ को कला की तरह गुनगुनाएँ।

– मनीषा कुमारी

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बंजर ज़मीन

बंजर ज़मीन

बंजर ज़मीन मेहनत की भूखी है
तभी तो ये सूखी है
ये बहुत मेहनत करवाती है
कहने को अनाड़ी है
लेकिन ये ही सबक सिखाती है
मेहनत का पाठ बताती है।
वैसे तो रुलाती है
लेकिन मन को मजबूत बनाती है।

– मनीषा कुमारी

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हाथों की लकीरें और पत्थर

हाथों की लकीरें और पत्थर,
दोनों को ही बदलना मुश्किल होता है।
लेकिन किसी न किसी दिन,
ये दोनों बदल के ही रेहते हैं।

– मनीषा कुमारी

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बातों की डोर

बातों की डोर,
आपस में ही मिल जाती है।
खुद से मिलकर,
खुद ही में उलझ जाती है।
दिल की उलझन,
दिल को बताती है।
की बातों की पतंग,
दिल में ही अटक जाती है।
बातों की डोर,
पतंगों को उलझती है।
पतंगों की डोर,
कभी सम्भल नहीं पाती है।
फिर उलझ के
नए कलाकृति दिखाती हैं।

– मनीषा कुमारी

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चुप्पी

लोगों पर चुप्पी लगती नहीं,
खुद पे लगाए तो जचती नहीं।
खुद की करे तो बेकार हैं
दूसरों की करे तो बेदिमाग है।
अपनी दुनिया में खुद ही बदनाम है
चुप्पी की कहानियाँ ही
बेमिसाल है।

– मनीषा कुमारी

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फर्क

फर्क है नज़रिए का,
देखने के नज़रिए का,
सोंचने के नज़रिए का।
मकान हो किराए का,
तो कोई अपना समझता है,
कोई किसी और का।
इस धरती पर रहने का,
ढंग बहुत अलग है,
केहने में और सहने में,
फर्क बहुत अलग है।
हर चीज़ को देखने का,
हर किसीका,
नज़रिया अलग है।
कोई अच्छे को बुरा,
बुरे को अच्छा ठहरा दे,
कोई खुद की रोटी में खुश है
किसी को छीनी हुई रोटी पसंद है।
फर्क है नज़रिए का,
हर बात को परखने का।

– मनीषा कुमारी