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खुश रहने का यही उपाए…

जाने हर कोई,
खुशियों के फूलों को,
बस उसे उगाना भूल जाते हैं।
लोग कितना भी करे काम कोई,
व सुबह खुश होना भूल जाते हैं।
खुश रहने का यही उपाए,
हर कोई भूल जाते हैं।

– मनीषा कुमारी

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कृपाबाई साथिनधान : भारत की पहली महिला लेखक।

Krupabai Satthinadhan

कृपाबाई साथीनाधन भारत के प्रथम लेखिका थी भले ही इन्होंने अपनी किताबें अंग्रेजी में लिखीं थीं। इन्होंने कुल तीन किताबें लिखीं हैं जो कि समाज की परेशानियों से जुड़ी हैं। इन्होंने पहली पुस्तक अपनी भाई के मोत के बाद लिखी अपने भाई के ऊपर।

First book written by Krupabai

उनका जन्म 1862 में अहमदनगर में हुआ था। इनकी माता का नाम राधाबाई खिष्टि और पिता का नाम हरिपन्त था। इनके माता – पिता ने अपने धर्म मे बाद में परिवर्तन करा लिया था यानी हिन्दू से क्रिश्चयन धर्म को अपना लिया था। इनके पिता की मृत्यु बहुत पहले ही हो गयी थी तब लेखिका बच्ची ही थी। लेखिका के पिता के मृत्यु के बाद उनकी माता, लेखिका और उनके भाई भास्कर को लेकर अहमदनगर से कहीं और चली गयी। भास्कर हमेशा लेखिका को प्रोत्साहित करते थे और हमेशा लेखिका के जहन में ये बात डालते रहते थे कि अपनी किताबों को उधार देती रहा करो, इसके साथ ही कई सारे मुद्दों में वे लेखिका से बात किया करते थे। लेकिन भास्कर भी अब दुनिया में नहीं रहे उनका देहांत हो गया। उसके भाई के मोत के बाद लेखिका ने उनके भाई पर आत्मकथा सबंधी किताब लिखी जिसका नाम था “Saguna : A story of Native Christan life” । इसके बाद करूपाबाई ने दूसरी किताब लिखी ” Kamala, A story of Hindu life ” 1894।

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ये दोनों किताबें जाती, लिंग, जातीयता और संस्कृति की पहचान पर आधारित है। इन दोनों किताबों की विषय वस्तु सामान्य है। इन दोनों ही किताबों की विषय वस्तु है हमारे समाज में महिलाओं की दुर्दशा और समाज के ढाँचों वे लोकतांत्रिक ढाँचों पर भी नज़र डाली गई है। कमला और सगुण दोनों किताबें अलग – अलग डिग्री का सामना करते हैं। सगुण काफी हद तक आत्मकथात्मक है। लेखिका के धर्म परिवर्तन के बाद उन्होंने काफी संघर्ष के बाद एक अच्छी शिक्षा प्राप्त की। एक अच्छे मेडिकल कॉलेज में प्रवेश किया।

कृपाबाई को अपने भाई के मोत का काफी आघात पहुँचा था जिसके बाद दो यूरोपियन ईसाई धर्म प्रचारक महिलाओं ने लेखिका के पढ़ने, लिखने और देखभाल के जिम्मा उठाया। उसे पढ़ने के लिए मुम्बई के बोर्डिंग स्कूल में डाल गया। वे कई चिकित्सक महिलाओं से मिली जो कि अमेरिकन थी। उनसे मिल कर लेखिका काफी प्रभावित हुई जिसकी वजह से लेखिका को दवाईयों में रुचि होने लगी। उन्होंने अपने पिता के धर्म प्रचार को समझा और एक चिकित्सक बनने का फैसला किया जो बिमार औरतों का इलाज कर सके, खास कर उन औरतों का जो पर्दा करती हैं। इसी बीच उनकी तबियत खराब होने लगी, फिर भी वे स्कॉलरशिप जीत गयी जिसमें उन्हें इंग्लैंड जाने का मौका मिला मेडिसिन पढ़ाई करने के लिए लेकिन लेखिका को इसकी इजाज़त नही दी गयी। इस वजह से उन्हें मद्रास मेडिकल कॉलेज में प्रवेश दिया गया 1878 में और फिर लेखिका अंतेवासी बनी आदरणीय डब्ल्यू. टी. साथिनधान जो कि जाने माने धर्म प्रचारक थे। लेखिका की शैक्षिक योग्यता शुरुआत से अच्छी थी लेकिन ज़्यादा काम करने की वजह से उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था, जिसके कारण उन्हें स्वस्थ ठीक करने के लिए उनकी बहन के पास पुणे भेज दिया गया 1879 में।

कुछ साल बाद वे मद्रास वापस आ गयी जहाँ पर लेखिका समूल साथिअन्धान से मिली और उनसे दोस्ती हो गयी, जो कि रेवरेंड के पुत्र थे। 1881 में कृपाबाई और समुल ने शादी करली। उसके तुरंत बाद समुल की नोकरी ब्रिक्स मेमोरियल स्कूल में हेडमास्टर के रूप में लग गयी जो कि ऊटकामुण्ड में कृपाबाई ने मुस्लिम लड़कियों के लिए स्कूल खोला चर्च मिशनरी सोसाइटी की मदद से, और लेखिका ने कई और लड़कियों को भी पढ़ाया। ऊटकामुण्ड एक हिल स्टेशन है जिसका वातावरण इतना अच्छा है कि लेखिका की तबियत हमेशा अच्छी रहती थी जिसके कारण उन्हें लिखने का काफी वक्त मिल जाया करता था, जिससे वे ज़्यादा से ज़्यादा लिखती थीं। ज्यादातर उन्होंने ” An Indian lady” के ऊपर लिखा था। तीन साल बाद लेखिका और उनके पति राजमुंदरी चले गए और वहाँ जाते ही लेखिका फिर बीमार पड़ गयी इसलिए वे वहाँ से कुंभकोणम में चले गए। लगातार उनके स्वास्थ्य में परिवर्तन आने के कारण वे काफी परेशान थीं, इसलिए फिरसे लेखिका हमेशा के लिए मद्रास आ गयी 1886 में। जहाँ आते ही उन्होंने एक बड़ा उपन्यास लिखना प्रारम्भ किया।

सगुण जो कि कृपाबाई की पहली किताब थी, उसे 1887 से 1888 में मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज के मैगज़ीन छापा गया था। इसी बीच उसका बच्चा का अपने जन्म तिथि के पूर्व ही देहांत हो गया जिसके कारण लेखिका बहुत ज़्यादा मायूस व उदास हो गई। इस कारण उन्हें ट्यूबरक्लोसिस के लक्षण उनके शरीर में पता लगने लगे, लेकिन उन्हें ये बताया गया कि उनकी ये बीमारी जल्द ही ठीक हो सकती है। जब लेखिका को पता लगा कि उनके पास बहुत कम समय है जीने के लिए, तब उन्होंने कमला नाम की किताब में काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने आखरी साँस तक काम किया। आखिर में उनकी मृत्यु 1894 में हो गयी। लेखिका की मृत्यु उनके प्रशंसकों के लिके काफी चोंकाने वाली थी इसलिए कृपाबाई के मृत्यु के कुछ महीने बाद लेखिका की याद में एक स्कॉलरशिप रखा गया मद्रास मेडिकल कॉलेज में। साथ ही एक मैडल रखा गया मद्रास विश्वविद्यालय में दसवीं कक्षा की काबिल अंग्रेजी की छात्र के रूप में। उनके किताबों को आगे प्रकाशित किया गया और उनके उपन्यास को तमिल भाषा में अनुवादित किया गया।

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इंतेकाम की आग

इंतेकाम वो आग है,
जो इंतेकाम से मिलकर,
आग का दरिया बना दे।
समुन्द्र जितने पानी से भी,
जिसकी प्यास न बुझे।
मिट्टी के छिड़काव से,
हर दरिया समान लगे।
फूलों के हार से,
फिर हर शमशान सजे।

– मनीषा कुमारी

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तुम्हे जल्दी बहुत थी

हम धीरे धीरे चलते थे,
तुम्हे जल्दी बहुत थी।
हम हर चीज़ में धीरे थे,
तुम हर चीज़ में जल्दी करते थे।
जल्दी जल्दी में तुम,
मुझे पीछे छोड़ आये जिंदगी।
लेकिन अब भी हम,
धीरे ही चलेंगे जिंदगी।
क्योंकि तेज़ी में हर काम,
बिगड़ते ही हैं जिंदगी।

– मनीषा कुमारी

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समय के साथ

सब कुछ सीख जाता है,
सब कुछ जान जाता है,
हर बात मान लेता है,
हर कुछ ठीक हो जाता है,
खुद पर विश्वाश हो तो,
समय के साथ,
सब कुछ ठीक हो जाता है।

– मनीषा कुमारी

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खुशियों का मोहल्ला

खुशियों का मोहल्ला,
खुशियों से सजा था।
घूमने को उसमें,
हर महल सजा था।
कुछ ही पल को,
वो मोहल्ला दिखा था।
खुशियों की गाड़ी को,
अब अलविदा कहना था।

– मनीषा कुमारी

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बादलों ने सूरज से…..

बादलों ने सूरज से सीखा,
खिलना फिर रंगों में घुलना।
रात के अँधेरे के बाद,
फिर से खिल कर बिखर जाना,
हर पल खुद को बदलना।
कभी कभी मिल कर,
फिर जम के बरस जाना।

– मनीषा कुमारी

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गंभीरता चली गयी…

झूटी दुनिया की,
झूटी बातें,
चुभती तो बहोत है,
लेकिन सच है,
की अब आदत सी है।
आज कल हम बातों को,
गंभीरता से लेते नही।

– मनीषा कुमारी

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शायद सच नही मेरा सच

शायद सच नही मेरा सच,
लेकिन कहने में कैसा खर्च।
लोगों की बातें,
लोगों की सोंच होती है।
हम कुछ भी कहे,
उनको गलत ही सोंचना होता है।

– मनीषा कुमारी

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लोगों की बातें, लोगों की सोंच…

शायद सच नही मेरा सच,
लेकिन कहने में कैसा खर्च।
लोगों की बातें,
लोगों की सोंच।
हम कुछ भी कहे,
उनको गलत ही है सोंचना।

– मनीषा कुमारी