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Motivational Musings poetry

जानना तो हर कुछ था…

जनना तो हर कुछ था,
जाना भी बहोत कुछ था।
कई मंजिलों को टटोला था,
फिर भी हमे हर मंजिल से दूर होना था।
बातों की सेर में फंस कर,
यूँ हमे रोना था।
किसी को दोष दिये बिना ही,
हमे आगे बढ़ना था।
पास आकर भी हमे,
हर कुछ भूलना था।

– मनीषा कुमारी

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Musings poetry

हमे बेकार बताने लगे

किसी को सहारा क्या दिया,
वो तो हमारे घर को अपना बताने लगे।
मना करने पर बात को,
हमे बेकार बताने लगे।

– मनीषा कुमारी

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Musings poetry

मैं वो किताब हूँ

मैं वो किताब हूँ,
जिसे पढ़ना मुश्किल है,
पढ़लिया तो समझना मुश्किल है,
जान लिया बताना मुश्किल है।
तड़पता है दिल आँसूओं से,
इसे समझाना मुश्किल है।
खुद उलझें हैं,
इसलिए किसी को,
बताना मुश्किल है।
मैं वो किताब हूँ,
जिसे पढ़ना मुश्किल।

– मनीषा कुमारी

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Motivational

पहली गाड़ी

पहली गाड़ी,
थी तो प्लास्टिक की,
लेकिन सीखा बहुत कुछ देती थी।
बताती भी बहुत कुछ थी।
जितनी बार टूटती थी,
उतनी बार कुछ बोलती थी।
वह पहली गाड़ी,
थी तो प्लास्टिक की,
लेकिन सीखा बहुत कुछ देती थी।

– मनीषा कुमारी

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Motivational Musings

जिंदगी की छोड़ पर…

लो चले हम,
दुनिया की छोड़ पर,
जाने किस मोड़ पर,
मंजिल की तलाश में।
पास के तालाब में,
डूब रहे मुसाफिर,
रुक गए हैं थोड़ा,
आराम की चाह में।
हम तो चलें हैं फिर भी,
जिंदगी की छोड़ पर।

– मनीषा कुमारी

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हम बुरे तो नही थे

हम बुरे तो नही थे,
लेकिन हमें,
बुरा साबित कर दिया उसने।
जो खुद दस बुराई लेकर घूमता है,
उसे जनता कोई नही था,
लेकिन खुद को,
वो जानामाना साबित कर गया।
हम बोझ नही थे,
फिर भी हमे,
वो बोझिल साबित कर गया।

– मनीषा कुमारी

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Motivational Musings

कहने सुनाने की बातें बहोत थीं…

कहने सुनाने की,
बातें बहोत थीं।
लोगों ने जो सुनाई,
वो रातें बहोत थीं।
न थी अधूरी,
कोई भी कहानी।
जानें कि बातें,
जाने के रास्ते,
अलग – अलग थे।
कुछ साथ,
कुछ अलग थे।
फिर भी न पा पाय,
उस रास्ते को।
क्योंकि हमारी मंजिल के रास्ते,
अलग – अलग थे।

– मनीषा कुमारी

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खेल खेल के दुनिया सारी

खेल खेल के दुनिया सारी,
खेल में ही चली जाती है।
न देखती दाँए बाएँ,
न देखती आगे पीछे।
खुद के मन से रुक जाया करती हैं,
कभी खुद ही चल जाया करती है।
कभी ये रुलाती है, कभी ये सताती है,
कभी साथ दे जाती है।
लाते लाते रंग कई,
रंगोली सी बिखर जाती है।

– मनीषा कुमारी

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Motivational

बहोत कुछ कहना है

बहोत कुछ कहना है,
बहोत कुछ सुनाना है।
इस मतलबी जहाँ में,
बहोत कुछ कर दिखाना है।
जबां है कि चलती नही,
मन है कि रुकता नही।
होंसलें भी नही झुके,
तुम्हारी ठोकरों से हम न रुके।
तुम हमे गिराते चले गए ,
और हम बार बार खड़े हुए।
तुम्हारी अदृश्य बेड़ियों से,
हम डरते नही।
जहाँ तक तुम्हारी सोंच थी,
हम उससे आगे निकल गए।

– मनीषा कुमारी

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कभी हौसला न हुआ

न हिम्मत हुई,
न हौसला हुआ।
जिंदगी में कई बार
भरोसा भी मिला।
न रास्ते रहे,
न उनका भूलना हुआ।
रास्तों पे हमने,
कई कई लोग देखे,
लेकिन उसका न मिलना हुआ,
न बोलना हुआ।
फिर कभी हमे जाने क्यों
कभी हौसला न हुआ।

– मनीषा कुमारी