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होंसलें कम नही

याद आया बिता हुआ कल,
रो पड़े हर एक कण,
झुंझला गए तीखी बोलियों से,
गरज उठे तन और मन।
टूट पड़ा अब सब्र का बांध,
पीटने को जी है चाहता,
लेकिन ये जी पीट नही पाता,
रूह में इतनी ताकत नही,
लेकिन होंसले भी कम नही।

– मनीषा कुमारी

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रोज़ नई खुशियाँ मना लो….

लगे हैं सब ढूढ़ने,
कुछ खुशमिजाजी लोगों को,
यूँ ढूंढ़ते ढूंढ़ते मिले कुछ लोग।
थे उसमे कुछ अच्छे भी,
तो कुछ थे अलग मिज़ाजी भी।
कुछ करते थे बुराई सबकी,
कुछ थे पसंद सबकी।
ये अलग सलीके के खुशमिजाजी,
कुछ को भाते कुछ को नही।
फिर भी लोग ढूंढ रहे,
कुछ खुशमिजाजी लोगों को।
यूँ ढूंढते ढूंढते तुम तंग आजाओगे,
क्यों न खुद ही छोटी छोटी खुशियों का,
एक घर बना लो।
रोज़ कोई त्योहार हो,
रोज़ नई खुशियाँ मना लो।

– मनीषा कुमारी

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किताबों का खज़ाना

खज़ाना मिला नही अब तक,
यूँ तुमसे दूर बैठे हैं।
यूँ किताबों का खज़ाना,
मिल जाये एक दिन।
ज़माने भर की ख्वाईशों को,
हम भूल बैठेंगे।
खज़ाना मिला नही अब तक
यूँ तुमसे दूर बैठे हैं…
मिल जाओगे कभी जिंदगी में हमे,
खुशी से हम तुम्हारा स्वागत करेंगे।
मिल जाए अगर साथ तुम्हारा,
तो शब्दों के खज़ाने के, धनी हम होंगे।

– मनीषा कुमारी

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व्यवस्थापन

व्यकूलता, व्यग्रता,
व्यापक हो गई।
व्याकरण में,
व्याघात है आई।
व्यापकता है हर ओर छाई,
व्याख्यान कोई कर न लाई।
व्यापार,व्यापारी व्यापी हुए,
व्यामोह भी बढ़ता जाए।
व्यस्त व्यवहारिकता बढ़ी चले,
व्येक्ति न है व्येसनी ज़्यादा।
व्येक्तित्व को अपने निखारता,
व्यायाम संग जीवन,
व्यतीत है करता।
व्यवहार्य रूप से खुद को अपनाता,
व्यवस्थापन से है जीवन भर का नाता।

– मनीषा कुमारी

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एक बात दबी रही

दुनिया की इस मस्ती में,
दुनिया की इस कश्ती में,
दुनिया की आँखों से,
दुनिया के नगरों को देखा,
दुनिया के रंग रोगन में,
एक दाग छुप सा गया।
एक बात दबी रही,
सिहाई में बंधी रही।

– मनीषा कुमारी

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जरूरी नही

जरूरी नही की हम, अपनी बात सबको सुनाएँ,
जरूरी नही की सब तुम्हे सनें,
और सब तुम्हे समझ भी जाये।
कुछ लोग तमाशा बनाने का मौका नही छोड़ते,
जरूरी है की कुछ बातें खुद तक रहे,
खुद को बता कर खुदही सम्भल जाए।

– मनीषा कुमारी

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नया माह

नए माह की शुरुआत अच्छी है,
नया दिन, नया सवेरा, नई रात अच्छी है।

नए उमंगों की बरसात अच्छी है,
नए दिन की जोश भरी शुरुआत अच्छी है।

माना मंजिल मिलने की बात कच्ची है,
फिर भी कोशिश की शोर मची है।

हर नए वक्त में एक – एक कदम आगे है,
फिर भी  जितने की आस अच्छी।

– मनीषा कुमारी