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Motivational Musings poetry

हमने मंज़िल

हमने मंजिल छोटी चुनी,
तो हम लोगों को छोटे लगने लगे।
वहाँ तक तुम न पहोंच पाए,
तो हम तुम्हे नीच लगने लगे।

– मनीषा कुमारी

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Musings poetry

मैं वो किताब हूँ

मैं वो किताब हूँ,
जिसे पढ़ना मुश्किल है,
पढ़लिया तो समझना मुश्किल है,
जान लिया बताना मुश्किल है।
तड़पता है दिल आँसूओं से,
इसे समझाना मुश्किल है।
खुद उलझें हैं,
इसलिए किसी को,
बताना मुश्किल है।
मैं वो किताब हूँ,
जिसे पढ़ना मुश्किल।

– मनीषा कुमारी

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Motivational poetry

कुछ लोग

कुछ लोग बुरा होके,
बुरे ही रहते है।
खुद बुरे होते हैं,
दूसरों को भी बुरा ही समझते है।
खुद के घटिया दिमाग से,
औरों को दूषित करते है।

– मनीषा कुमारी

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मूर्ख कहे, कि बुरे लोग

हम जान बुझ के हार गए,
वो हमे ताने देने लगे।
हमने उनसे माफी मांगी,
की कहीं झगड़ा न होजाये।
वो तो अपना अहम बताने लगे।
हम पीछे हट गए ,
कि बात न बढ़ जाय,
वो तो अपनी ताकत बताने लगे।
सच बात है कि ऐसे लोगों को
मूर्ख कहे, कि बुरे लोग,
ये बताना किसी,
नेक के बस की बात नही।

– मनीषा कुमारी

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मजबूरी बहोत है…

भरोसा तो किसी पे नही मुझे
लेकिन भरोसे करने की,
मजबूरी बहोत है।
चाहती तो कुछ भी नही
किसी से लेकिन,
मजबूरी बहोत है।
परेशान तो हूँ, हर किसी से
लिकेन परेशान होने की,
मजबूरी बहोत है।
चले तो जाते कबका
इस दुनिया से लेकिन,
रुकने की मजबूरी बहोत है।

– मनीषा कुमारी

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भगवान

बुरा वक्त चाहे
कितना भी बुरा हो
लेकिन माँ-बाप कभी
साथ नही छोड़ते।
ऊपर वाला भी बड़ा
मेहरबान रहता है,
उस वक्त जिस वक्त
किसी के माँ-बाप
साथ नही रहते।

– मनीषा कुमारी

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People are like apples!

When you get an apple
With a spot on it,
remove the spot with a knife
most of the time,
the spot is not very deep.
A spotless apple is very expensive
and difficult to find.
It is similar to people
who live in this world.
We have to remove
that spot with your mental knife.

– Manisha kumari

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जिंदगी

दुनिया दुनिया कहते रहे
दुनिया छूट गई,
मंजिल तो आगे थी पीछे जमाना छोड़ गई,
समझदारी समझ छोड़ उलझ गई,
जिंदगी की नाव बीच समंद्र में ही छोड़ गई
जिंदगी की आखरी मोड़ पर ही
जिंदगी समझ आ गई।

– मनीषा कुमारी

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यादें

समय का इंतजार करते करते
समय बीत जाता है,
समय तो बचपन जैसे पीछे ही
छूटता जाता है।
जिंदगी की इस राह में समय के पाबंद लोग
भी थम जय करते है।
अगर बीत जाए लम्हा तो वापस नही आता लेकिन यादों का सिलसिले रोके नही रूकते,
बीच काम मे ही कहीं से वापस आजाया करता है।

– मनीषा कुमारी

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नफरत की आग

कैसी है ये दुनिया
कैसा है ये मानव
नफरत से नफरत की आग में,
सारे हैं अभिमान में,
जान के ये दुनिया की रीत,
झुलस रहे नफरत की आग में।
धन दोलत तो है ही वजह,
बिन वजह भी नफरत है छाई।

– मनीषा कुमारी