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Motivational Musings poetry

किताब हो तो ऐसी

किताब हो तो ऐसी,
जिस में कोई बात हो,
हर पन्ने पे राज़ हो,
बातों की लड़ी लगी हो,
और हर शब्द खास हो।
गत्ते भी कहानी बोले,
खुशबू भी राज़ खोले,
किरदार भले हो भोले,
परन्तु लगे जैसे कोई सामने से बोले।

– मनीषा कुमारी

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Motivational Musings poetry

पंखुरी उखाड़ कर

पंखुड़ी उखाड़ कर फूलों से कहतें हैं,
अब तुम सूंदर नही दिखती।
इतनी ही नफरत थी,
तो फूल को जिंदगी में लाये ही क्यों थे।

– मनीषा कुमारी

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Motivational Musings poetry

व्हाट्सएप

व्हाट्सएप ने क्या खेल है खेला,
किसी को पास लाया,
किसी को जुदा किया।
कभी अपना समझा,
कभी पराया।
कभी हमे खुशियाँ दी है,
कभी हमे रुलाया।
व्हाट्सएप ने दुनिया को,
पास के साथ साथ,
दूर भी है बुलाया।

– मनीषा कुमारी

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Motivational Musings poetry

बातों की समझ

हर बात जानें क्यों,
आखिर में समझ में आती है।
जिस बात में दम नही,
सबसे पहले वो समझ आती है।

– मनीषा कुमारी

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Friendship Motivational poetry

दोस्ती कोई बंधन नही

दोस्ती कोई बंधन नही,
दो अलग भावनाओं का संगम है।
अरे वो दोस्ती क्या करेगा,
जो ढंग देख कर रंग बदलते हैं।

– मनीषा कुमारी

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Musings poetry

दिल का दर्द

दिल का दर्द,
और शब्दों का अर्थ,
हर कोई नही समझ पाता।
लोग कहते हैं,
जीना आसान है बहोत,
फिर भी कोई कर नही पाता।

– मनीषा कुमारी

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Motivational Musings poetry

स्वाद के कब्जे में सारे

स्वाद के कब्जे में सारे
सारे बने स्वाद के नोकर
नोकर नोकर ही कहलवाते
कहलवाते जाते हैं ये नोकर
नोकर बन कर ही रहते हैं
ये लोग बस उसी में खुश हैं
स्वाद के पीछे ही भागते जाते
स्वास्थ्य का कोई ध्यान नही रखते
धीरे धीरे गुलाम बनाते
स्वाद के ये खट्टे मीठे सैनिक
धीरे धीरे कर ये सैनिक
स्वाद के कब्ज़े में सारे।

– मनीषा कुमारी

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Motivational Musings poetry

कुछ के सवाल

कुछ के सवालों से ही,
किसी का चरित्र पता चलता है।
देश दुनिया अलग होती है,
फिर भी वो एक कहता है।

– मनीषा कुमारी

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Motivational Musings poetry

कलम की पुकार

कुछ कहना, लिखना,
सिर्फ क्रिया नही,
भावनाएँ हैं दिल की।
बात से बात की,
जुड़ती है पहेली।
हर दिन हर पल,
एक बात है कहती।
मुझे लिखो मुझे सुनाओ,
मुझे भावनाओं में गढ़ते जाओ।
बार बार ये पुकार के कहती,
जानती नही में सारी बातें,
फिर भी कुछ कहना हूँ चाहती।

– मनीषा कुमारी

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Motivational Musings poetry

जानना तो हर कुछ था…

जनना तो हर कुछ था,
जाना भी बहोत कुछ था।
कई मंजिलों को टटोला था,
फिर भी हमे हर मंजिल से दूर होना था।
बातों की सेर में फंस कर,
यूँ हमे रोना था।
किसी को दोष दिये बिना ही,
हमे आगे बढ़ना था।
पास आकर भी हमे,
हर कुछ भूलना था।

– मनीषा कुमारी