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Motivational Musings poetry

देखा देखी

दूसरों की देखा देखी में,
डूबे हैं सारे।
दूसरा जो करेगा, वही हम करेंगे
खुद का दिमाग लगाएंगे तो बंद पड़ जाएंगे।
दूसरों की चीजों को ही आजमाएंगे,
नहीं तो हम बंद पड़ जायँगे।
दूसरों की देखा देखी,
इतनी पड़ी भारी।
वो डूबा है,
अब हमारी बारी।

– मनीषा कुमारी

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शब्दों के तीर

शब्दों के तीर
चुभते ज़रूर हैं।
लेकिन इसी से कोई सीख, देते जरूर हैं।
जब भी चुभते हैं,
जिन्दगी बदलने की ताकत रखते हैं।
आते जाते ये तो,
बहुत कुछ बता देते हैं।

– मनीषा कुमारी

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किस्मत के मोड़

मजबूरी तो नही,
किसी की बात मानना।
बस कभी कभी,
खुद भी चाहत होती है,
बात सुनले किसी की।
यूँ ही किसी पे तो,
भरोसा नही कर सकती।
लेकिन किस्मत के मोड़ का भी,
कुछ पता नही होता।

– मनीषा कुमारी

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सपनों का संकट

सपने बनने को हज़ार बन जाते हैं,
पूरे करते करते पसीने छूट जाते हैं।
एक सपना होता नही पूरा,
दूसरे सपने के, पूरे होने की चाह है।
आज का नही हर पल का है,
अब तो हर किसीका का है,
ये सपनों का संकट।

  – मनीषा कुमारी

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मणि और सनी

एक था मणि,
जिसका न कोई पहचान था,
जंगल जंगल भटकता था,
धीरे धीरे फिर पहचान बना
बनते बनते नाम बना।
आगे बढ़ा सपने सजाये,
लोग रोके तो भी न रुके,
सपनों को अपने गढ़ते जाए।
फिर उसका साथी आया,
नाम अपना सनी बताया।
सपने थे उसके भी बड़े,
लेकिन पल पल वो रो देता था।
मेहनत बहुत करता था,
लोगों से वो डरता था,
लोगों के कुछ कहने भर से,
मायूस वो हो जाता था।
मणि ने उससे दोस्ती की,
दिल की बात सनी ने कही।
मणि बहोत समझदार था,
उसने फिर सनी को समझाया,
दुनिया सारी शिक्षक हमारी,
लोगों की बातें गुरु हमारी,
खट्टी मीठी इसकी कहानी।
अच्छी सिख पास रख लेना,
बुरी बातों को नकार देना।
मंजिल है तुम्हारी खुद को बनाना,
अब आगे तुम बढ़ते जाना।
दोनों फिर साथ रहे,
सुख दुख सब बाँट लिए
खुद को बना आगे बढ़े।

– मनीषा कुमारी

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प्रकृति से दूरी

इस दूरी की वजह से,
पौधें दूर होते हैं,
जीव जन्तु दूर होते हैं।
लोग इसे नकारते हैं,
लेकिन ये वातावरण खराब करते हैं,
खूबसूरती खराब करते हैं।
ये प्रकृति को मिटाते हैं,
ये हरियाली को डुबाते हैं।
ये प्रकृति से दूरी,
सब कुछ मिटाते हैं।

– मनीषा कुमारी

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ठंड इतनी बढ़ गयी…

ठंड इतनी बढ़ गयी,
की नए पत्ते भी आने से डरे।
लोग इतने बिछड़ गए,
की कोई अपना न दिखाई दे।
बातों बातों में अपशब्द निकलते हैं,
खुद की पहचान भूल बैठे हैं।
कोई दुखी हुआ हँसता है,
कोई हँसते हुए रोता है।
ठंड इतनी बढ़ गयी,
की नए पत्ते भी आने से डरे।
लोग निकलते नही बाहर,
और पतझड़ का इंतज़ार करते हैं।

– मनीषा कुमारी

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साल का पहला महीना

थोड़ा अच्छा था,
थोड़ा बुरा था।
ये महीना कुछ अलग था,
कभी खुशी की लहर थी।
कभी दिल में हल चल थी,
कभी बुराई का साया था,
तो कभी अच्छाई की रोशनी।
सच मे ये साल का पहला महीना,
थोड़ा अच्छा था,
थोड़ा बुरा था।

– मनीषा कुमारी

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जाने क्या लोग कहते हैं…

जाने क्या लोग कहते हैं,
बातों ही बातों में,
कई राज खोलते हैं।
क्यों किसी का गम खोदते हैं,
लोगों की बातें समझ तो नही आती,
फिर भी सुनने की कोशिश करते हैं।
इतनी सारी बातों में,
बातों का पता नही।
जाने क्या लोग बोलते हैं,
बातों ही बातों में,
कुछ तो राज खोलते हैं।

– मनीषा कुमारी

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सब्र टूटते देर नही….

सब्र टूटते देर नही,
लोगों को टूटते देर नही,
खुदसे रूठते देर नही।
हर बात की जल्दी है,
हर काम की जल्दी है,
रुकने के वजह हज़ार,
लेकिन दुनिया से बिखरते
देर नही लगती।

– मनीषा कुमारी