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Motivational Musings poetry

रिश्तों की होड़

देखो कैसा ये रिश्तों का डोर,
लड़के वाले
और लड़की वालों के बीच,
कैसी ये होड़।
इतनी तो न होती,
कभी घोड़ों दौड़।
इनकी तुलना में है,
आम जैसे फल।
प्रकार जिसके कई हैं,
स्वाद भी अलग – अलग।
कभी संस्कारी कभी मॉडर्न का छिलका,
कभी मांगो में गाँव वाली चाहिए,
कभी शहर की कोई लड़की चाहिए,
नही तो सिर्फ घरवाली चाहिए।
सच में अनोखी है,
ये रिश्तों की होड़।

– मनीषा कुमारी

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लोग बरसते हैं

लोग बरसते हैं,
बरसने के लिए।
हम गरजते हैं
गरजने के लिए।
लेकिन अब अपनी,
दुनिया ही अलग है।
हम छाँव लाते हैं,
बरसने के लिए,
गरजते सिर्फ तूफानों में हैं।
लोग चाहे बरसते हैं,
बरसने के लिए।

– मनीषा कुमारी

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मूर्ख बनने बनाने का सिलसिला

मूर्खता होती नहीं,
हो जाती है।
कभी फिक्र से,
कभी दिल से,
कभी मन से,
कभी अनजाने में।
मूर्ख बनाने बनने का सिलसिला,
चलता बिगड़ता रहता है।
मूर्ख बनना कोई,
बुरा नहीं।
कभी – कभी मूर्ख बनना तो
खुद के हँसी का,
कारण बनता है।
मूर्ख बनाने बनने का सिलसिला,
बनता बिगड़ता रहता है।

– मनीषा कुमारी

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कुछ बाकी है..

लिखना तो कुछ नही
लेकिन लिख कर भी
बहुत कुछ लिखना बाकी है।
कई शब्दों को पढ़ना,
कई किताबों को टटोलना बाकी है
नही है जिंदगी, फिर भी
जीना बाकी है।
हर मुश्किल के बाद भी
परेशान होना बाकी है।
उदास बहुत हैं,
लेकिन खुश होना बाकी है।
जिंदगी की राह में अभी,
बहुत दूर चलना बाकी है।
देखो कहीं,
जिंदगी रो तो नही रही,
अभी बहुत रूठना बाकी है।
जिंदगी की राह में
बहुत दूर चलना बाकी है
न जाने कौनसा गिला है हमें
की हमें गिर कर फिर,
उठना बाकी है।

– मनीषा कुमारी

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भावों की पकड़

दिन रात सोंचना,
भागदौड़ फिर सोंचना,
कभी खुश होना,
कभी रोना,
कभी कभी,
गुस्सा न बर्दाश्त होना,
चलना फिर रुक जाना,
सारे लक्षण हैं हमसे,
भावों की पकड़ का न होना।
भावों की पकड़ में इंसान,
बहोत शांत होता है।
भावनाओं में बहने से,
इंसान ही बह जाता है।
शांत से अशांत होजाना,
सारे लक्षण हैं हमसे,
भावों की पकड़ का न होना।

– मनीषा कुमारी

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नज़ारा मिला

यूँ बातों का हमे
गुब्बारा मिला,
आँधी का कोई
नज़ारा मिला,
हमारे बिना बोले ही
समुन्द्र में तूफान का
नज़ारा मिला।

           – मनीषा कुमारी

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प्रेरणा तुम

प्रेरणा तुम बनी नहीं,
बनाई गई हो।
हम तुम पर कुछ,
बोलना चाहते नहीं थे,
हमसे तो बुलवाया गया है।
प्रेरणा तुम हमारी बनी नही,
बनाई गई हो।
नही तो ख्यालों में भी,
तुम्हारा ज़िक्र नही था।
तुम तो खुद हमारे पास,
चल कर आई हो।
हमने तो ख्वाबों में भी,
तुम्हारा ज़िक्र न किया।
तुम साक्षात हमारा,
रोज़ नाम लिया करती हो।
तुम तो हमारे मुस्कुराहट का,
गुणगाण किया करती है।
प्रेरणा तुम बनी नही,
बनाई गई हो।

– मनीषा कुमारी

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चश्मे वाले

अभी तक तो न छू पाया,
कोई चश्मा हमे,
या हम चश्मे को।
न कभी आँखों ने,
चश्मा बरदाश्त किया।
बस कुछ पहेली सुलझानी है लोगों कि,
की कोई बिना चश्मे वाला,
आवारा नही होता।
ज़्यादातर चश्मे वाला,
पढ़ाकू नही होता।

– मनीषा कुमारी

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दिल से आवाज़ निकली

खुद के दिल से जो आवाज़ निकली,
बस वही जरूरी बात निकली।
कभी किसी के बातों को समझ कर भी,
हमसे कोई बात न निकली।
खुद के दिल से जो बात निकली,
बस वही बात खास निकली।
हर एक राज़ की बात में से,
निन्यानवे प्रतिशत अफवाह निकली।
खुद के दिल से जो आवाज़ निकली,
बस वही बात खास निकली।

– मनीषा कुमारी

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दो बातों के बीच

असमंजस में है मन,
किसी दो बातों के बीच,
की पा लिया सब कुछ
ये जिंदगी है,
की सब कुछ मिलता जा रहा,
ये जिंदगी है।

       – मनीषा कुमारी