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Musings poetry

ख्याल नहीं रहता बातों का

कभी- कभी कुछ बातों का,
ख्याल नहीं रहता।
जिंदगी में कुछ लोगों का,
पता नहीं चलता।
लिखना था,
किसी ओर की कहानी।
गलती से,
खुद की कहानी लिख बैठे।

– मनीषा कुमारी

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Motivational Musings poetry

कदर बातों की

कभी बे मतलब की,
बातों में लगे रहे।
कभी बातों की,
कतार में खड़े रहे।
जिन बातों की,
तलाश में लगे रहे।
उस बातों की,
ध्यान में लगे रहे।
कदर उन बातों की,
अब किसी को न रहे।

– मनीषा कुमारी

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दूसरों की बातों पे आना….

दूसरों की बातों पे,
आना आसान है।
कभी खुद से
कुछ सोंच के देखो,
कभी खुदसे
किसी के बारे में जान के देखो।
बिना तालाब में डूबे,
तालाब की गहराई का
पता नहीं लगता।
बिना फल खाये,
फल का स्वाद पता नहीं चलता।
यहाँ नेता कैसा है,
वो चुनाव के बाद पता चलता है
और लोग
किसी रेहन सहन के तरीके से ही
किसी का चरित्र भाँपने लगते हैं।

– मनीषा कुमारी

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कभी – कभी हम…

कभी – कभी हम
कुछ बोल के भी,
बोल नहीं पाते।
रोकना है किसी को,
लेकिन रोक नहीं पाते।
बातें बहोत सी है कहने को,
बस कह नही पाते।
रोने के सिवा ,
कभी – कभी कोई चारा नहीं होता।
गुस्सा करने का
कोई फायदा नहीं होता
कुछ बातें भूल के भी भूल नहीं पाते।
जीने को जी लेते हैं,
कहने को कुछ बोल नहीं पाते।

– मनीषा कुमारी

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सच्ची हैं वो बातें…

अपनी ओर से,
लिखना तो बहुत कुछ है
चाह के भी कभी कभी,
लिखना मुश्किल है।
कुछ बातें ऐसी हैं
की लिखना मुश्किल है।
बुरी नहीं वो बातें
बस सच्ची हैं वो बातें।

– मनीषा कुमारी

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सियाही को चाहिए सहारा

सियाही को चाहिए सहारा
कलम का,
शब्द लिखने के लिए।
इंसान को चाहिए सहारा,
शुद्ध विचार का
सुविचार लिखने के लिए।

– मनीषा कुमारी

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झूठी तारीफ

झूठी तारीफ भी,
कभी – कभी सही लगती है।
कुछ पल के लिए ही सही,
चेहरे पे खुशी छा जाती है।
जानते सब हैं,
खुद के बारे में
लेकिन तारीफें तो,
सबको अच्छी लगती है।

– मनीषा कुमारी

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इंसान देख शेर…

आज एक इंसान को देख,
शेर घबरा गया।
बोला में सिर्फ
जंगल में राज़ करता हूँ,
सामने तो दुनिया पर
राज़ करने वाला आ रहा
उस इंसान को देख
शेर भी सीधा चलना सीख गया।
उस शेर ने अब,
बोलना छोड़ दिया।

– मनीषा कुमारी

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दिल काँच के होगए

दिल काँच के होगए,
छोटी छोटी बातों पे,
रूठने – टूटने लगे।
कभी हँसते- हँसते रोते हैं,
कभी रोते- रोते हँसते हैं।
सेहन करना,
नजरअंदाज करना बातों को,
भूल से चुके हैं।
धीरे- धीरे दिल,
काँच से बन गए हैं,
साफ तो हैं,
लेकिन फिर भी धुंधले लगते हैं।

– मनीषा कुमारी

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फीकापन

फीकापन है सूनापन,
लेकिन सब कुछ
सूना होना भी अच्छा है।
अपने और दूसरों के बारे में
पता तो चलता है।

फीकापन भी अजीब दवा है,
अच्छा तो नहीं लगता,
लेकिन सब कुछ
सही कर देता है।

जिंदगी में फीकापन
खुद से मिलाता है
और खाने में फीकापन
स्वास्थ्य ठीक करता है।

– मनीषा कुमारी