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Motivational Musings

सिख लिया

मैने जीना सीख लिया
इस भीड़ की जहां में
मैने रहना सिख लिया।
दो पल की बात भी
दिल दुखा देती है
हमने बिन बातों के भी
रहना सिख लिया।
इस भीड़ की जहां में
अकेले रहना सिख लिया।

– मनीषा कुमारी

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Musings

हम तो हार गए

छोटी सी शुरुआत थी,
अंत तक पहुंचना था।
चलते चलते हम रुक गए,
बहोत परेशान हो गए।
अब सब कुछ छोड़ दिया,
क्या आगे बढ़े की,
जिंदगी धीमी हो गयी।
एक छोटी सी तकलीफ से,
हम तो हार गए।

– मनीषा कुमारी

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ख्याल तो बहोत है

ख्याल तो बहोत हैं मन मे,
बस उन्हें बुनना बाकी है।
ख्यालों के इस रास्ते मे,
बिखरे हुए बादलों में,
इस बिखरती रोशनी का,
साथ भी पाया है।
विचारों के झरनों में
खुद को तपाया भी है।
बस नदियों के रास्तों को
बनाते बनाते जाना है,
विचारों के सागर में
मिलते जाना है।

– मनीषा कुमारी

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क्यों न दोस्ती कर लें..

मन को डाँट के रखो,
तो और उलझ जाता है।
क्यों न दोस्ती कर लें,
मन और मैं।
साथ मिल कर्म करे,
साथ मिल घूमें,
साथ मिल पहोंचे,
मंजिल की डगर पर।

– मनीषा कुमारी

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क्या दुश्मनी है, फूलों से

जानें क्या दुश्मनी है,
फूलों से लोगों को।
जैसे ही खिलने की कोशिश करे,
वैसे ही कोई मसलने आ जाता है।
जब भी कोई खुश हो उसे,
रुलाने आजाता है।

– मनीषा कुमारी

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संस्कार सीखा रहे..

संस्कारों की बात वो कर रहे,
जिन्हें अपनी संस्कृति तक नही पता।
जिस मुँह से वो संस्कृति का,
गला घोंट चुके हैं।
आज वो उसी मुँह से
संस्कार सीखा रहे।

– मनीषा कुमारी

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जिंदगी उदास बहोत है..

बहोत दूर है जिंदगी,
जो रोती बहोत है।
जिंदगी चलती बहोत है,
पीछे हटती बहोत है।
खो गया हो कुछ जैसे,
जिंदगी उदास बहोत है।

– मनीषा कुमारी

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मूर्ख कहे, कि बुरे लोग

हम जान बुझ के हार गए,
वो हमे ताने देने लगे।
हमने उनसे माफी मांगी,
की कहीं झगड़ा न होजाये।
वो तो अपना अहम बताने लगे।
हम पीछे हट गए ,
कि बात न बढ़ जाय,
वो तो अपनी ताकत बताने लगे।
सच बात है कि ऐसे लोगों को
मूर्ख कहे, कि बुरे लोग,
ये बताना किसी,
नेक के बस की बात नही।

– मनीषा कुमारी

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मजबूरी बहोत है…

भरोसा तो किसी पे नही मुझे
लेकिन भरोसे करने की,
मजबूरी बहोत है।
चाहती तो कुछ भी नही
किसी से लेकिन,
मजबूरी बहोत है।
परेशान तो हूँ, हर किसी से
लिकेन परेशान होने की,
मजबूरी बहोत है।
चले तो जाते कबका
इस दुनिया से लेकिन,
रुकने की मजबूरी बहोत है।

– मनीषा कुमारी

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नफरत की आग

कैसी है ये दुनिया
कैसा है ये मानव
नफरत से नफरत की आग में,
सारे हैं अभिमान में,
जान के ये दुनिया की रीत,
झुलस रहे नफरत की आग में।
धन दोलत तो है ही वजह,
बिन वजह भी नफरत है छाई।

– मनीषा कुमारी