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व्यवस्थापन

व्यकूलता, व्यग्रता,
व्यापक हो गई।
व्याकरण में,
व्याघात है आई।
व्यापकता है हर ओर छाई,
व्याख्यान कोई कर न लाई।
व्यापार,व्यापारी व्यापी हुए,
व्यामोह भी बढ़ता जाए।
व्यस्त व्यवहारिकता बढ़ी चले,
व्येक्ति न है व्येसनी ज़्यादा।
व्येक्तित्व को अपने निखारता,
व्यायाम संग जीवन,
व्यतीत है करता।
व्यवहार्य रूप से खुद को अपनाता,
व्यवस्थापन से है जीवन भर का नाता।

– मनीषा कुमारी

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